शैलेन्द्र सरोज | 2 कविताएं | हिन्दी श्री

शैलेन्द्र सरोज

1. मेरी टूटी खिड़की से हवा आती है

मेरी टूटी खिड़की से
हवा आती है
गुलचीर से छनकर
जहरीले दूध से हवा आती है
और दम घोटते विचार
किसी ने डाल से
पत्ती तोड़ी हो
किसी ने छाल नोची हो
किसी ने खाल नोची हो ,
और रक्त मेरा बहा
कुछ पेड़ का सफेद खून,
और भी यादें थीं
अंदर मन मे रक्त पीकर
बस शान्त रहा
मेरी आलोचना का दौर
मीठी से तीखी यादें
बस मैं ही गुनाहगार था
सही बात करके मैं बीमार था ,
सब जुड़े थे भावना से
मैं अकेला था ?
प्रतीक्षा में
कालांतर स्थापित वो
जहरीली हवा
मेरा दम घोंट गयी
मैं जीवित था
अपने संघर्षों में
अपने स्वप्न मेंऔर मुझे
वो संसार आज मिथ्या लगता है
बड़ा विचित्र सुनता हूं मैं
अपनी कहानी
बेचकर अपने जीवन को
रोकता मन की रवानी
कल्पना में जहर नही
बस वह पाया
जहरीले संसार मे
वो खिड़की समाज की थी,
वैमनस्य फैला था
और मैं भी ,
बस वो जहरीली डाल काट दी
और सोचता हूं अब
वो आये कल्पना के साथ
 पर वास्तव में आए
खुश होकर
प्रतीक्षारत हूं सदियों सेस्वप्न में साक्षात ।

2. विचारों को बहा दिया

विचारों को बहा दिया
पत्ते के ऊपर रखकर दिया
और बहता गया 
विचार सभी धाराओं में
टकराया वामपंथियों से
जो मेरे विचार के अग्रज
आज उनको कागज पर
 एक शब्द लिखकर दिया
धाराओं में और वादों में
बहुत कुछ
खटकता रहाऔर वो
सीधी रेखा चलता रहा,
आगेप्रपात से ऊंचा मोड़
और विचार गिरने को
और वह गिर गया ,
मोड़ लाने का प्रयास किया
किंतु सीधी रेखा में मोड़ नही लगते
मैंने मोड़ को भी हटा दिया
जब गिरा वोबड़ी शालीन सी दिखी
मुझे ये दुनियां और जब गिर गया
फिर पड़ा रह गया वहीं
आगे न बढ़ सका
घसीटना चाहामन की रस्सी से
आत्मा के बल सेऔर सात्विक
दृष्टि सेवो न उठ सका बस खींच लाया
उसको किनारे
उस समाज से और वह बोला
क्या दिया तुमने मुझेमैं मुस्कुराया
और बोलाये स्थिर धरती,
और जलशांति में व्यतीत कुछ पल
इस पर वह धराशायी हुआ
और याचना की,
मैं युगों से चलता रहा
बदलता रहा ,
मुझे चीरते रहे वोस्वार्थी ,
पापी और मैं उनके होठों पर
बदलता रहा
मुझे लगा मैं एक स्वर्णिम सत्य हूं
लेकिन वो मुझे आज भी गढ़ते हैं
और मुझे बदलने कीवो वृत्ति दी ,
जो तुमने मुझको दी
और आज वही समाज
शब्द भंडार में मंडराता हुआ
अंधेरी विचारधारा पर
रखता एक छोटा दियातले पर
अंधेरालेकिन तुमने मुझे
वो सत्य दियाएक विचार, अप्रतिम ।

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