शैलेन्द्र सरोज | 2 कविताएं | हिन्दी श्री
1. मेरी टूटी खिड़की से हवा आती है मेरी टूटी खिड़की सेहवा आती हैगुलचीर से छनकरजहरीले दूध से हवा आती हैऔर दम घोटते विचारकिसी ने डाल सेपत्ती तोड़ी होकिसी ने छाल नोची होकिसी ने खाल नोची हो ,और रक्त मेरा बहाकुछ पेड़ का सफेद खून,और भी यादें थींअंदर मन मे रक्त पीकरबस शान्त रहामेरी आलोचना का दौरमीठी






