अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, लखनऊ (संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश) और के.बी.पी.जी. कॉलेज, मीरजापुर के संयुक्त तत्वावधान में गणेशगंज स्थित शिक्षा संकाय के सभागार में सात दिवसीय ‘बोधि-पथ कार्यशाला’ आयोजित की जा रही है। शनिवार को कार्यशाला के पांचवें दिन बतौर मुख्य अतिथि बोलते हुए जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग विश्वविद्यालय, चित्रकूट के कुलपति प्रोफेसर शिशिर चंद्र पांडेय ने कहा कि जीवों के प्रति दृष्टिकोण को समझने के लिए पारिस्थितिकीय और बौद्ध दोनों प्रणालियाँ बेहद महत्वपूर्ण हैं। जहाँ विज्ञान अंतर्संबंधों पर जोर देता है, वहीं बौद्ध दर्शन करुणा और अहिंसा को केंद्र में रखता है।

कार्यशाला में विशिष्ट वक्ता के रूप में उपस्थित जी.डी. बिनानी पी.जी. कॉलेज, मीरजापुर के इतिहास विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. ऋषभ कुमार ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण कोई आधुनिक अवधारणा नहीं है। इसे मानव जीवन का एक चेतन अस्तित्व और मूल कर्तव्य (धर्म) माना गया है। बौद्ध दर्शन इसी समृद्ध भारतीय ज्ञान परंपरा का एक अभिन्न हिस्सा है, जो आज के वैश्विक पर्यावरण संकट को सुलझाने के लिए सबसे व्यावहारिक और संतुलित मार्ग दिखाता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे के.बी.पी.जी. कॉलेज के प्राचार्य प्रोफेसर रविन्द्र कुमार द्विवेदी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि बौद्ध दर्शन आज के आधुनिक और तनावपूर्ण परिवेश में पूरी तरह प्रासंगिक है, क्योंकि यह सीधे तौर पर मानवीय दुखों के व्यावहारिक समाधान पर केंद्रित है। जहाँ आज का समाज मानसिक तनाव, पर्यावरण संकट और उपभोक्तावाद से जूझ रहा है, वहीं बुद्ध के विचार जीवन जीने का एक संतुलित मार्ग (मध्यम मार्ग) दिखाते हैं।

कार्यशाला का संचालन संयोजक डॉ. कुलदीप पाण्डेय ने किया तथा अंत में डॉ. राजमणि सरोज ने सभी अतिथियों व प्रतिभागियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में शिक्षा संकाय अध्यक्ष प्रोफेसर भवभूति मिश्र, प्रो. इन्दुभूषण द्विवेदी, प्रोफेसर भानु प्रताप सिंह, प्रोफेसर अर्चना पांडेय, प्रोफेसर नम्रता मिश्रा, डॉ. करनैल सिंह, डॉ. रविंद्र प्रताप सिंह, डॉ. प्रीतम सिंह, डॉ. सतीश चंद्र वर्मा, डॉ. प्रांकुर आनंद सहित कॉलेज के अन्य प्राध्यापकगण और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
