अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, लखनऊ (संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश) और के.बी.पी.जी. कॉलेज, मीरजापुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय ‘बोधि-पथ कार्यशाला’ के चौथे दिन शुक्रवार को पर्यावरण और जीव संरक्षण में बौद्ध दर्शन की प्रासंगिकता को रेखांकित किया गया। प्रथम सत्र में काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी के इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर प्रवेश भारद्वाज ने ‘सतत विकास एवं पर्यावरण संरक्षण में बौद्ध दृष्टिकोण’ पर व्याख्यान दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय ज्ञान परंपरा में पर्यावरण को एक जड़ वस्तु न मानकर ‘चेतन अस्तित्व’ और ‘माता’ का दर्जा दिया गया है, जहाँ मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक हिस्सा है। वैदिक काल से लेकर बौद्ध दर्शन और रामायण जैसे महाकाव्यों तक, हमारी परंपरा में प्रकृति, पर्यावरण और वन्य जीवों के संरक्षण को धर्म और नैतिक कर्तव्यों से जोड़कर देखा गया है।

द्वितीय सत्र में इतिहास विभाग, डी.ए.वी. पी.जी. कॉलेज, वाराणसी की प्रोफेसर प्रतिभा मिश्रा ने बताया कि ईसा पूर्व छठी शताब्दी में भगवान बुद्ध ने जो उपदेश दिए, वे आज के पर्यावरण संकट के समाधान के लिए बेहद प्रासंगिक हैं। बौद्ध दर्शन मुख्य रूप से निम्नलिखित सिद्धांतों पर पर्यावरण चेतना की बात करता है। कार्यशाला की अध्यक्षता प्राचीन इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रो. इन्दुभूषण द्विवेदी ने की।कार्यशाला के संयोजक डॉ. कुलदीप पाण्डेय ने पूरे कार्यक्रम का कुशल संचालन किया और प्रोफेसर भानु प्रताप सिंह ने अतिथियों व प्रतिभागियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। इस महत्वपूर्ण शैक्षणिक आयोजन में प्रो. अर्चना पांडेय, प्रो. नम्रता मिश्रा, डॉ. अमित कुमार सिंह, डॉ. रवीन्द्र प्रताप सिंह, डॉ. राजमणि, डॉ सतोष वर्मा, डॉ. प्रभु नाथ यादव, डॉ. करनैल सिंह सहित कॉलेज के अन्य प्राध्यापक और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

